भारत विद्या केन्द्र (Bharat Vidya Kendra)

प्रस्तावना

भारतवर्ष अपने जीवन के उषःकाल से ही ज्ञान की साधना में रत रहा है। इसीलिए इसका नाम ‘भा’ अर्थात् प्रकाश= ज्ञान में रत ‘भारत’ पडा है। अपनी इसी महत्ता के कारण ही भारत ने सहस्राब्दियों तक न केवल विश्व का सांस्कृतिक नेतृत्व किया है अपितु ज्ञान-विज्ञान, कला-कौशल, अध्यात्म और व्यापार के क्षेत्र में भी अग्रणी भूमिका का निर्वाह किया है। तक्षशिला, शारदा, नालन्दा, विक्रमशिला आदि विश्वविद्यालयों तथा ऋषि-मुनियों की तपस्या एवं ज्ञान-साधना से अभिषिक्त यह भूमि जगद्गुरु के रूप में विश्वविख्यात रही है। किन्तु दुर्भाग्यवश पाश्चात्य शिक्षा पद्धति के प्रभाव में स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भी भारतीय ज्ञान-परम्परा के महनीय योगदान तथा वैभव के प्रति हम विश्व तथा भारतीय युवापीढी को जागरुक करने में अपेक्षाकृत रूप से सफल नहीं हो पाए हैं। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए महात्मा गाँधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय, बिहार के कुलपति प्रो० सञ्जीव कुमार शर्मा द्वारा विश्वविद्यालय में भारत-विद्या केन्द्र की स्थापना की गई है। इस केन्द्र के समन्वयक के रूप में संस्कृत जगत् के उद्भट् युवा विद्वान् एवं विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के अध्यक्ष प्रो० प्रसूनदत्त सिंह को नियुक्त किया गया है।


क्षेत्र एवं उद्देश्य

प्रो. प्रसून दत्त सिंह के निर्देशन में सञ्चालित भारत-विद्या केन्द्र के उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

  • वैश्विक ज्ञान-परम्परा में भारत-विद्या के महत्त्व को रेखांकित करते हुए उसका विश्वव्यापी प्रचार-प्रसार करना ।
  • भारत विद्या के प्रति आधुनिक युवा पीढी को जागरूक करना तथा भारत के स्व के प्रति उनके स्वाभिमान को जगाना ।
  • आधुनिक विज्ञान एवं भारतीय परम्परागत ज्ञान में सामञ्जस्य स्थापित करते हुए सतत विकास को ध्यान में रखते हुए मानवजनित समस्याओं के समाधान का प्रयास करना ।
  • भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान-विज्ञान के संरक्षण के साथ- साथ उसको समसामयिक सन्दर्भों में संवर्धित करना ।
  • भारतीय ज्ञान-परम्परा को आधार बनाकर अन्तर्विषयी शोध को बढावा देना ।
  • भारतीय ज्ञान-परम्परा से सम्बन्धित (विशेष रूप से बिहारप्रान्त में उपलब्ध) पाण्डुलिपियों/हस्तलिपियों का संरक्षण करना ।
  • वैदिक-ज्ञान, संस्कृत-साहित्य, दर्शन, भाषा, कला, शिक्षा, इतिहास, अर्थशास्त्र आदि महत्त्वपूर्ण ज्ञानानुशासनों के माध्यम से विश्व को भारत की देन से अवगत कराना।
  • भारत-विद्या पर समकालीन अध्ययनों (भारतीय एवं पाश्चात्य) का अनुशीलन करना।
  • भारत-विद्या से सम्बन्धित भारत एवं विश्व में हो रहे कार्यों का संकलन करना ।
  • आधुनिक विज्ञान की प्रगति में भारत विद्या के स्रोतों की भूमिका का अध्ययन करना ।
  • भारत विद्या से सम्बन्धित समस्त सामग्री का एकत्रीकरण एवं अपेक्षित प्रकाशन करना।

शैक्षणिक एवं शोध गतिविधियाँ

भारत-विद्या केन्द्र द्वारा निम्नलिखित शैक्षणिक एवं शोध गतिविधियाँ संकल्पित हैं-

  • संस्कृत साहित्य के संरक्षण-संवर्धन हेतु भारत विद्या केन्द्र एवं संस्कृत विभाग के संयुक्त तत्त्वावधान में अखिल भारतीय स्तर पर संस्कृत साहित्य, भाषा, कला, शिक्षा, वैदिक-ज्ञान, दर्शन, इतिहास आदि पर बृहद् संगोष्ठियों एवं छात्र-छात्राओं हेतु भारतविद्या से सम्बन्धित विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाएगा । प्रतियोगिता में विजित छात्रों हेतु पुरस्कार भी प्रदान किए जाएँगे।
  • भारतविद्या से सम्बद्ध समस्त उपलब्ध सामग्री एवं कलाओं की चित्रप्रदर्शनी की व्यवस्था की जाएगी जैसे- परम्परागत विद्या के केन्द्र, ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थल, चित्रकला, शिल्पकला आदि।
  • भारत-विद्या से सम्बन्धित पाठ्य-सामग्री के बृहत् संकलन हेतु ‘भारत-विद्या पुस्तकालय’ की स्थापना की जाएगी ।
  • कार्यशालाओं एवं संगोष्ठियों के आयोजन के माध्यम से दार्शनिक/आध्यात्मिक सृजनशीलता पर भारतीय एवं पाश्चात्य दृष्टि से तुलनात्मक परिचर्चा तथा शोध की सम्भावनाओं का प्रयास किया जाएगा ।
  • ‘भारत-दर्शन’ नाम से एक षाण्मासिक शोध-पत्रिका का प्रकाशन किया जाएगा ।
  • भारत विद्या के प्रति आधुनिक पीढी को जागरूक करने हेतु विश्वविद्यालय के चयनित छात्र-छात्राओं को भारत विद्या से सम्बन्धित केन्द्रों का भारत-दर्शन नाम से वार्षिक शैक्षिक भ्रमण कराने की व्यवस्था की जाएगी।
  • भारतीय विद्या अध्ययन नाम से एक ‘षाण्मासिक प्रमाणपत्रीय पाठ्यक्रम (Six months certificate course)’ की व्यवस्था की जाएगी।
  • प्रस्तावित पाठ्यक्रम वेद, उपनिषद, दर्शन, कलाओं, प्राचीन इतिहास तथा संस्कृति पर आधारित होगा।

केन्द्र द्वारा प्रस्तावित एकवर्षीय कार्ययोजना

भारत-विद्या केन्द्र द्वारा संकल्पित उद्देश्यों की पूर्त्ति एवं केन्द्र के सम्यक् संचालनार्थ निम्नलिखित एकवर्षीय कार्ययोजना प्रस्तुत है-

  • केन्द्र की गतिविधियों के सम्यक् संचालनार्थ एक ‘परामर्शदात्री समिति’ के गठन किया जाएगा ।
  • अखिल भारतीय स्तर पर ‘कालिदास महोत्सव’ का आयोजन किया जाएगा ।
  • भारतीय ज्ञान-परम्परा के संरक्षणार्थ केन्द्र द्वारा एक ‘चित्रवीथिका-प्रदर्शनी’ की व्यवस्था की जाएगी।
  • भारतीय ज्ञान परम्परा से सम्बन्धित सप्तदिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया जाएगा ।
  • राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों का आयोजन किया जाएगा।
  • आयुर्वेद एवं योग शिविर का आयोजन किया जाएगा।
  • आरम्भिक रूप से एक लघु पुस्तकालय की स्थापना की जाएगी ।
  • भारतीय विद्या अध्ययन नाम से एक ‘षाण्मासिक प्रमाणपत्रीय पाठ्यक्रम (Six months certificate course)’ हेतु सप्ताह में दो दिन 4:00 से 6:00 बजे तक विशेष कक्षाओं का आयोजन किया जाएगा।
  • भारत-दर्शन के नाम से विश्वविद्यालय के छात्रों को भारतीय ज्ञान-परम्परा से सम्बन्धित किसी ऐतिहासिक स्थल का शैक्षिक-भ्रमण कराया जाएगा ।